Sunday, August 9, 2009

'राज्यपाल ने की राजनीति'

पूर्व मंत्री कालूलाल गुर्जर का आरोप है कि आरक्षण संबंधी विधेयक को मंजूरी देने में देरी करके राज्यपाल शीलेन्द्र सिंह ने राजनीति की है। कांग्रेस को लाभ पहुंचाने के लिए ऎसा किया गया। जबकि आरक्षण की नींव पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने रखी थी। गुर्जर ने सिंह को राज्यपाल पद से हटाने की मांग की।
रविवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में गुर्जर ने कहा कि राज्यपाल सिंह ने उनके साथ धोखा किया। यदि वे एक साल पहले आरक्षण विधेयक पर हस्ताक्षर कर देते तो समाज के कई लोग इसका फायदा उठा सकते थे। इसमें हुई देरी के कारण भर्तियों के दौरान कई लोग वंचित रह गए। उन्होंने कहा कि राज्यपाल को ही जब कानूनी राय लेने में एक साल का समय लगेगा तो आम लोगों की क्या स्थिति होगी। गुर्जर ने कहा कि विधेयक को नवीं अनुसूची में डलवाने के लिए वे पूरी कोशिश करेंगे। संवाददाता सम्मेलन में भीलवाडा से शांतिलाल गुर्जर, अजमेर से किशन गुर्जर, गोपाल कसाणा, रामा गुर्जर आदि भी मौजूद थे।
आंतरिक रूप से साथगुर्जर ने दावा किया कि भाजपा शासन में हुए गुर्जर आंदोलन के दौरान आंतरिक रूप से वे गुर्जरों के साथ थे। उनकी सरकार होने के कारण वे खुलकर सामने नहीं आ सके। उनके बेटे ने किसी के उकसाने पर ही उन पर आरोप लगाए होंगे। उनके परिवार में आज भी कोई मतभेद नहीं है।

सरकार पर बनाएंगे दबाव

'अब चैन से नहीं बैठेंगे। भ्रष्ट नौकरशाहों, नेताओं और भूमाफिया के खिलाफ एकजुट होकर लडेंगे। राज्य सरकार पर दबाव बनाकर मजबूर कर देंगे कि, हमारी बात सुने और समस्या का निस्तारण करे।'
जमीन के दर्द पीडित महासंघ ने रविवार को इस संकल्प के साथ आर-पार की लडाई का ऎलान किया है। रामनिवास बाग स्थित नेहरू उद्यान में दोपहर दो बजे से सायं चार बजे तक महासंघ की बैठक हुई। पूर्व पुलिस महानिदेशक अमिताभ गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सहकारिता मामलों के विशेषज्ञ विमल चौधरी एवं वरिष्ठ अधिवक्ता पूनम चंद भंडारी ने पीडितों को सम्बोधित किया। पूर्व पुलिस महानिदेशक ने पीडितों से कहा कि वे सरकार पर दबाव बनाएं, ताकि सरकार ऎसी व्यवस्था करे जिससे भूमाफिया और भ्रष्ट अधिकारियों में डर पैदा हो। विमल चौधरी ने कहा कि पीडित न्यायालय में विश्वास रखें। न्याय में कुछ देरी हो सकती है, लेकिन पीडित को न्याय जरूर मिलेगा।
ऎसा सोचा ना थामहासंघ संरक्षक अमिताभ गुप्ता ने कहा कि 9 अगस्त 1942 के दिन भारत छोडा आंदोलन की शुरूआत हुई और आज से हम अपना आंदोलन शुरू कर रहे हैं। जिन्होंने आजादी के लिए जीवन की आहुति दी, उन्होंने सोचा नहीं था कि आजादी के बाद ऎसी व्यवस्था होगी।
जनहित याचिका लगाएंगेअधिवक्ता भंडारी ने कहा कि वे उच्च न्यायालय में सभी पीडितों की ओर से जनहित याचिका लगा न्याय दिलाने का प्रयास करेंगे। हमारा प्रयास रहेगा कि न्यायालय सरकार को आदेश दे कि वह पीडितों को भूखंड दिलाने की व्यवस्था करे।
सरकार तक पहुंचेगी 'बात'महासंघ सचिव विजय शर्मा ने कहा कि इंसाफ मिलने तक लडाई जारी रहेगी। महासंघ अध्यक्ष वी.एन. अग्रवाल, शिक्षा विहार संघर्ष समिति की किरण राठौड, जय माता दी संघर्ष समिति के सुरेंद्र शर्मा आदि ने भी विचार रखे। बैठक में तय हुआ कि जल्द ही मुख्यमंत्री और नगरीय विकास मंत्री को ज्ञापन दिया जाएगा।
यह उठी मांगें जमीन का दर्द दर्ज कराने के लिए विशेष थाना बने। मामलों की सुनवाई एवं त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अदालत बने। सरकार पीडितों को भूखंड मुहैया कराने की व्यवस्था करे। गृह निर्माण सहकारी समितियों को प्रतिबंधित कर प्रशासक नियुक्त किए जाएं। भूमाफिया एवं भ्रष्ट नौकरशाहों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
जमीन दे, या रूपएजयपुर। गोपालपुरा बाइपास पर अपनी जमीन पर निर्माण कार्य शुरू करते ही कुछ लोग बिल्डर को धमकाने पहंुचे गए। उन्होंने सोसाइटी के पट्टे दिखाते हुए जमीन का कुछ हिस्सा या पचास लाख रूपए की मांग कर डाली। बिल्डर गोपाल गुप्ता ने शिप्रापथ थाने में मामला दर्ज कराया है। गोपालपुरा बाइपास स्थित उनकी जमीन का जेडीए ने गत वर्ष पट्टा जारी किया था। गुप्ता ने निर्माण कार्य चालू करवाया तो शनिवार को किसी व्यक्ति का फोन आया और काम रूकवाने के लिए धमकाने लगा। आरोप है कि वह रविवार को कुछ लोगों को लेकर आया और काम रूकवाने के लिए धमकाया। थानाधिकारी वीर सिंह ने बताया कि गुप्ता ने प्रताप सिंह व विक्रम सिंह के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दी है।

भाजपा नेताओं में गर्मा-गर्मी

सरकार खोने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी में धडेबंदी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। रविवार को प्रतिपक्ष की नेता वसुंधरा राजे, प्रदेशाध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ललितकिशोर चतुर्वेदी, हरिशंकर भाभडा, गुलाबचंद कटारिया आदि नेताओं में खूब गर्मा-गर्मी हो गई। चतुर्वेदी की अध्यक्षता में बुलाई गई आज पहली बडी बैठक में राजे का भाषण नहीं हुआ। राजे समेत कई नेता खाना छोडकर चले गए। शाम तक चलने वाली बैठक दोपहर में खत्म करनी पड गई। पार्टी मुख्यालय में बैठक सदस्यता अभियान, पालिका-पंचायत-सहकारिता चुनाव, अकाल, कानून व्यवस्था आदि मसलों पर चर्चा के लिए हुई थी।
.....और फिर आपस में उलझेबाद में कोर ग्रुप की बैठक के नाम से अरूण चतुर्वेदी, राजे व सभी पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अलग कमरे में चले गए जहां फिर तनातनी हुई। भाभडा ने कटाक्ष किया कि उन्होंने तो पहले ही आशंका जता दी थी कि समानान्तर गतिविधियां चलेंगी। ललित चतुर्वेदी बीच में कुछ बोलने लगे तो राजे ने उनसे कहा बताया कि आपको हमने प्रदेशाध्यक्ष बनाया, राज्यसभा में भेजा...।
चतुर्वेदी ने पलटकर पांच साल जैसे तैसे गुजारने की बात कही, इस पर महेश शर्मा, कटारिया, ओमप्रकाश माथुर आदि नेताओं ने आपस में शांति से बैठकर बात करने की सलाह देते हुए शांत कराने की कोशिश की। राजे की शिकायत थी कि कोटा में ऎसे लोगों को सदस्यता अभियान का प्रभारी बना दिया जिन्हें पार्टी निलंबित कर चुकी।
-बहुत बढिया बैठक हुई। ऎसी कोई बात नहीं हुई। मैंने वहीं खाना खाया।-ललित किशोर चतुर्वेदी
-बहुत अच्छी बैठक रही।-गुलाब चंद कटारिया
-मैंने पार्टी मंच पर अपनी बात कही है। मेरा इतना सा कहना था कि मुझे भी पूछ लेते।-दुर्गासिंह रूद्र
-मैडम घर से खाना लेकर आई थी।-महेन्द्र भारद्वाज, प्रेस सलाहकार, नेता प्रतिपक्ष
यूं हुई शुरूआत...सहकारिता प्रकोष्ठ के अध्यक्ष दुर्गासिंह रूद्र ने दो दिन पहले सहकारिता चुनाव के लिए बनाई नेताओं की टीम का यह कहते हुए विरोध जताया कि मैं अध्यक्ष हूं और मुझे पूछा तक नहीं, इसलिए मैंने इस्तीफा दे दिया। कई ऎसे लोगों को इसमें लिया गया है, जो भाजपा के नहीं हैं। सूत्रों के अनुसार प्रदेशाध्यक्ष चतुर्वेदी ने रूद्र का गुस्सा शांत करने का प्रयास करते हुए सफाई दी कि सूची मेरे नाम से प्रदेश महामंत्री रामपाल जाट ने जारी की है। उन्होंने त्याग पत्र नामंजूर होने की भी बात कही। इस पर राजे ने विरोध जताया और उन्होंने चतुर्वेदी व रूद्र के लिए टिप्पणी की कि उन्हें कोई उकसा रहा है। ललितकिशोर चतुर्वेदी व कटारिया ने अरूण का पक्ष लिया। राजे ने सहकारिता प्रभारियों की सूची में दखल का कारण विधायकों को शामिल करना बताया तो कटारिया ने सवाल किया बताया कि वे भी विधायक हैं, उनका नाम तो नहीं है।
और खाना छोड गएराजे, चतुर्वेदी, माथुर, घनश्याम तिवाडी, रामदास अग्रवाल आदि नेताओं ने वहां खाना नहीं खाया। कटारिया, भाभडा, शर्मा ने वहीं भोजन किया।

Saturday, August 8, 2009

स्वाइन फ्लू से बेखबर यूपी सरकार

स्वाइन फ्लू ने बेशक दुनिया भर में दहशत फैला रखी हो, लेकिन लगता है कि यूपी सरकार को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। कम से कम इस बीमारी से निपटने की सरकार की तैयारियों को देखकर तो ऐसा ही लगता है। प्रदेश सरकार ने इस बीमारी से मुकाबले के लिए राज्य में 12 स्थानों पर स्पेशल आइसोलेशन वॉर्ड बनाए हैं। इनमें एक वॉर्ड नोएडा के जिला अस्पताल में भी बनाया गया है। लेकिन यहां मरीजों को न के बराबर सुविधाएं दी जाती हैं। आइसोलेशन वॉर्ड का नजारा तो किसी को भी हैरत में डालने के लिए काफी है। अस्पताल प्रशासन ने जनरल वार्ड नंबर-तीन में एक कोने में बने नर्सेज केबिन के बाहर पट्टी लगाकर उस पर आइसोलेशन वॉर्ड लिख दिया है। इस केबिन के ऊपर कोई छत नहीं है और पास के बेड पर लेटे मरीजों के वायरस एक दूसरे में आसानी से पहुंच सकते हैं। इस तथाकथित आइसोलेशन वॉर्ड में एक बेड और एक कूलर की व्यवस्था की गई है। कूलर खाली रहता है और उसमें पानी भरने की किसी को फुरसत नहीं है। इतना ही नहीं, अस्पताल प्रशासन के पास स्वाइन फ्लू से निपटने के लिए कोई दवा या टेस्ट किट भी नहीं है। ऐसे में यदि स्वाइन फ्लू का कोई मरीज आ जाए तो अस्पताल कर्मी उसके इलाज के लिए कितनी हिम्मत जुटा पाएंगे। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अस्पताल की चीफ मेडिकल सुपरिटंडंट डॉक्टर राजरानी कंसल का कहना है कि शासन ने दवा भेजी ही नहीं तो वे क्या करें। शासन का मौखिक निर्देश है कि स्वाइन फ्लू का कोई संदिग्ध केस आने पर दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में रेफर कर दिया जाए। उन्होंने बताया कि फिलहाल अस्पताल में बीमारी से पीड़ित कोई मरीज अब तक नहीं आया है। NBT

विपक्ष के नेता रहेंगे आडवाणी : बीजेपी

लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खराब प्रदर्शन के बाद काफी हिचकिचाहट के बाद विपक्ष का नेता बनने के लिए राजी होने वाले वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के बारे में पार्टी ने साफ किया कि वह इस पद पर पूरे कार्यकाल (पांच साल)के लिए बने रहेंगे। हालांकि, सूत्र बताते हैं कि आडवाणी पूरे पांच साल इस पद पर नहीं रहेंगे। और बहुत संभव है कि सुषमा स्वराज लोकसभा विपक्ष की नेता बनें। गौरतलब है कि लोकसभा में विपक्ष की उपनेता के रूप में सुषमा स्वराज और राज्य सभा में अरुण जेटली की भूमिका से आडवाणी बेहद खुश हैं। इस साल हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे 81साल के आडवाणी के राजनीति से सन्यास लेने की अटकलों पर विराम लगाते हुए बीजेपी ने ऐलान किया कि विपक्ष के नेता पद पर उनका चुनाव बिना किसी समयसीमा के किया गया है। सदन में बीजेपी की उपनेता सुषमा स्वराज ने कहा, हमने उन्हें (आडवाणी को ) पूरे कार्यकाल के लिए चुना है। हमने उन्हें किसी समयसीमा के लिए विपक्ष का नेता नहीं चुना है। मैं उनकी उपनेता होने के नाते पूरे अधिकार के साथ यह बात कह रही हूं। पंद्रहवीं लोकसभा का पहला बजट सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद आडवाणी की उपस्थिति में सुषमा ने संवाददाताओं से यह बात कही। आडवाणी ने भी सुषमा की बातों की पुष्टि करते हुए कहा, मैं जिस भी बात के लिए राजी हुआ, वह मेरी खुद की इच्छा रही। मेरा जो राजनीतिक जीवन रहा है और उसमें देश की ओर से मुझे जो प्रशंसा मिली है उसमें मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करता, जो मुझे पसंद न हो। लोकसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद आडवाणी ने वरिष्ठ नेताओं से कहा था कि वह विपक्ष का नेता नहीं बनना चाहते हैं और यह काम किसी और को सौंपा जाए। लेकिन इस पद के लिए बीजेपी के भीतर कोई आम राय नहीं बनने और इसे लेकर दूसरी पीढ़ी के नेताओं में जबर्दस्त घमासान मचने के कारण आखिरकार पार्टी के आग्रह पर आडवाणी नेता प्रतिपक्ष का पद स्वीकारने के लिए राजी हो गए। पार्टी ने सक्रिय राजनीति में आडवाणी की भूमिका के बारे में अनिश्चितता को शिमला में 19 अगस्त से होने जा रही चिन्तन बैठक से पहले दूर किया है। इस चिन्तन बैठक में लोकसभा चुनाव में पार्टी की हुई हार के कारणों की समीक्षा की जानी है। इस बैठक में पार्टी के 25 वरिष्ठ नेताओं के शिरकत करने की संभावना है लेकिन अभी उनके नामों को अंतिम रूप नहीं दिया गया है। लोकसभा चुनाव के बाद यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह और अरुण शौरी ने आडवाणी सहित पार्टी नेतृत्व पर आरोप लगाया कि हार के कारणों की समीक्षा करने की बजाय इसके जिम्मेदार लोगों को पुरस्कृत किया जा रहा है। आडवाणी ने जब लोकसभा में बीजेपी संसदीय दल का नेता बनने की सहमति दी, तो अटकलें लगाई गईं कि वह इस पद पर अस्थायी रूप से रहेंगे और पार्टी की दूसरी पीढ़ी में मचे घमासान के शांत होने के बाद वह इस पद से हट जाएंगे। अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे दूसरी पीढी के नेताओं को क्रमश: राज्यसभा में विपक्ष का नेता तथा लोकसभा में उपनेता बनाए जाने के बाद भी अटकलों का बाजार गर्म था कि आडवाणी अब पार्टी नेतृत्व में युवाओं को आगे करेंगे।

सरकार इधर भी दे ध्यान

संसद के आखिरी दिन राज्यसभा में बहुत ही रोचक विषय उठा। मामला भिखारियों से जुड़ा था और उठाने वाले थे भाजपा सांसद प्रभात झा। उन्होंने देश के लगभग 1 करोड़ 75 लाख भिखारियों की दशा का हवाला देते हुए ऎसा सवाल खड़ा किया कि सरकार को भी बगले झांकने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह मामला विशेष उल्लेख में उठाया गया। झा ने कहा कि देश में गरीबी मिटाने, बेकारी खत्म करने की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, समाज के इस वर्ग को देखने की फुर्सत सरकार को नहीं है। देश में गरीबी रेखा से नीचे और ऊपर की दो श्रेणियां हैं परन्तु भिखारियों के लिए इन दोनों श्रेणियों में कोई स्थान नहीं दिया गया है। उन्होंने समाज में दोयम दर्जे का जीवन जीने वाले इस वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ने की मांग करते हुए कहा कि सरकार अशक्त और अजीर्ण लोगों के लिए जिस तरह का बंदोबस्त करती है उसी तरह की व्यवस्था देश के कोने-कोने में फैले भिखारियों के लिए भी करे। उनका कहना था कि भिखारियों के लिए उचित प्रबंधन करने से जहां अपराध में कमी आएगी वहीं भारतीय समाज में बुजुर्ग, अशक्त लोगों की सदैव से मदद करने की जो परम्परा रही है उसका पालन होगा।

चिंतन बैठक टली एजेंडा भी बदला

भाजपा ने शिमला में होने वाली अपनी चिंतन बैठक को दो दिन के लिए टाल दिया है। अब यह 17 से 19 के बजाय 19 से 21 अगस्त को होगी। पार्टी ने तारीख आगे बढ़ाने के साथ एजेंडे में भी थोड़ा बदलाव किया है। बैठक में सिर्फ लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार की समीक्षा ही नहीं की जाएगी बल्कि आगे की रणनीति भी तैयार होगी। वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने स्पष्ट किया कि चिंतन बैठक सिर्फ हार की समीक्षा पर ही केंद्रित नहीं होगी। भविष्य में पार्टी को मजबूत बनाने का खाका भी खींचा जाएगा। उन्होंने बताया कि बंगाल और केरल जैसे राज्यों में अभी तक भाजपा अपना खाता नहीं खोल पाई है। शिमला में मिल-बैठकर सोचेंगे कि इन राज्यों में कमल कैसे खिलाया जाए। चिंतन बैठक में भाजपा और संघ के 25 वरिष्ठ नेता शामिल होंगे।इससे पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने बताया कि शुक्रवार सुबह शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी के आवास पर हुई कोर ग्रुप की बैठक में चिंतन बैठक को आगे बढ़ाने का निर्णय किया गया। इसकी वजह बताते राजनाथ ने कहा कि 17 अगस्त को आंतरिक सुरक्षा पर विचार-विमर्श के लिए प्रधानमंत्री ने दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की अहम बैठक बुलाई है जबकि 18 अगस्त को कर्नाटक और उत्तर प्रदेश विधानसभाओं के उपचुनाव हैं।प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बुलावे पर भाजपा शासित राज्यों गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री भी दिल्ली आएंगे जिससे चिंतन बैठक के लिए उनका 17 को शिमला पहुंचना कठिन हो जाता जबकि उपचुनाव की तैयारी भी प्रभावित होती। मुख्यमंत्रियों की व्यस्तता और उपचुनावों को ध्यान में रखकर चिंतन बैठक को दो दिन के लिए टालना बेहतर समझा गया।कोर गु्रप की बैठक में उन नामों पर भी मुहर लगाई गई जिन्हें चिंतन बैठक के लिए शिमला आमंत्रित किया जाना है। इस बीच सूत्रों ने बताया कि चिंतन बैठक हो जाए तो गनीमत समझिए। पार्टी के अंदर इसके औचित्य को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। एक धड़े का मानना है कि समीक्षा के दौरान जवाबदेही भी तय होगी जिससे फिर घमासान खड़ा होगा। इसके विपरीत चिंतन बैठक पर जोर देने वाले खेमे का तर्क है कि हार के कारण जाने बिना भविष्य की तैयारी मुमकिन नहीं। पहले यह बैठक महाराष्ट्र के ठाणे में 17 से 19 अगस्त को होनी थी, लेकिन राज्य भाजपा के विरोध के चलते इसे शिमला में करने का फैसला करना पड़ा। महाराष्ट्र में कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा की राज्य इकाई चिंतन बैठक में घमासान की आशंका से चिंतित हो गई। उसे लगा कि यदि लोकसभा चुनाव में हार की समीक्षा के दौरान बड़े नेताओं ने एक दूसरे पर दोषारोपण किया और गलती से भी अंदर की बात मीडिया में लीक हो गईं तो विधानसभा चुनाव में पार्टी के नतीजे प्रभावित हो सकते हैं।