Tuesday, January 5, 2010

भाजपा का छह महीनों से चला आ रहा विवाद हल

नई दिल्ली। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के प्रयासों और स्पष्ट रूख से राजस्थान भाजपा का छह महीनों से चला आ रहा विवाद हल हो गया है। पंचायत चुनावों के बाद संगठनात्मक चुनावों में अरूण चतुर्वेदी पार्टी के विघिवत अध्यक्ष चुन लिए जाएंगे, जबकि वसुंधरा राजे को पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव बनाया जा रहा है। भले ही फिलहाल वसुंधरा राजे विपक्ष की नेता नहीं रहेंगी, लेकिन अगले चुनावों में मुख्यमंत्री पद की दावेदार वही होंगी।

जानकार सूत्रों के अनुसार पार्टी के दिग्गज नेताओं ने 23 दिसम्बर को हुई बैठक में इस आशय की सहमति दे दी है। विपक्ष के नेता का विवाद भी करीब-करीब हल हो गया है। फरवरी में बजट सत्र से ठीक पहले विपक्ष के नेता का चुनाव किया जाएगा, जिसमें वसुन्धरा राजे की सलाह को महत्व दिया जाएगा। लगभग उसी समय भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन होगा, जिसमें राजे को महासचिव बनाया जाएगा। नितिन गडकरी मध्यप्रदेश में होने वाली राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अपनी नई टीम का परिचय करवाएंगे।
नेता प्रतिपक्ष गैर ब्राह्मण!राजस्थान में विपक्ष के नेता पद पर किसी गैर ब्राह्मण को ही चुने जाने के आसार हैं। इस पद पर गुलाबचंद कटारिया, दिगम्बर सिंह या राव राजेन्द्र सिंह में से किसी एक का चुनाव हो सकता है। वसुंधरा राजे को भले ही राजस्थान का प्रभारी महासचिव नहीं बनाया जाए, लेकिन राजस्थान में पार्टी मामलों में उनकी अहम भूमिका रहेगी।

दिल्ली में मिलेंगे तीन देशों के माओवादी नेता

जहां गृह मंत्री पी. चिदंबरम नक्सली समस्या से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां कर रहे हैं, वहीं माओवादी अपनी गतिविधियों का विस्तार पूरे दक्षिण एशिया में करने की तैयारी कर रहे हैं। इस सिलसिले में तीन देशों के माओवादी नेता इस महीने दिल्ली में इकट्ठा होने वाले हैं। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार नेपाल, श्रीलंका और भारत की माओवादी पार्टियों के प्रमुख नेता इस महीने के अंत में दिल्ली में मिलेंगे। इस बैठक में पाकिस्तान से भी माओवादी प्रतिनिधियों को आना था। लेकिन, वीजा न मिलने के कारण वे नहीं आ पाएंगे। सूत्रों के मुताबिक, नेपाल की माओवादी पार्टी के प्रमुख नेता बसंत अपने साथियों के साथ भारत पहुंचेंगे। श्रीलंका की सीलोन माओइस्ट पार्टी के प्रतिनिधि भी आएंगे। भारत की ओर से माओवादी नेता किशनजी और अनंत बैठक में शामिल होंगे।

'ब्राह्मण जमा पार्टी' को भारतीय जवान पार्टी में बदलेंगे गडकरी

बीजेपी के नए प्रेजिडेंट नितिन गडकरी धीरे-धीरे बीजेपी को संघ के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रहे हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार आजकल मीडिया से खूब रूबरू हो रहे गडकरी बीजेपी को ब्राह्मण जमा पार्टी की संज्ञा दिए जाने से काफी असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कहीं न कहीं वह खुद भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। बीजेपी के ब्राह्मण जमा पार्टी का नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि बीजेपी के वर्तमान स्वरूप में पार्टी में संगठन और संसदीय दल दोनों ही जगह ब्राह्मणों का ही बोलबाला है। शुरुआत करते है संगठन से, तो बीजेपी के नजरिए से देखे तो आरएसएस का आशीर्वाद प्रात्त नए अध्यक्ष नितिन गडकरी स्वंय ब्राह्मण जाति से संबंधित है। उनके अलावा पार्टी के लोकसभा में नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता अरुण जेतली भी ब्राह्मण वर्ग से ही आते हैं। वैसे कभी संघ की पसंद रह वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी भी उच्च कुलीन ब्राह्मण है। इसके अलावा दिल्ली में पार्टी की उठापटक में शामिल रहने वाले अनंत कुमार भी इसी जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। संगठन में संजय जोशी जैसे लोग भी हैं जिन्हें कुछ अपने ही लोगों ने मिल कर बाहर कर दिया था, संगठन में उनकी वापसी की संभावनाएं बनने लगी हैं, वह भी ब्राह्मण ही है। इसी तरह पार्टी की प्रदेश इकाइयों में भी अनेक पदों पर ब्राह्मणों का ही साम्राज्य ही है। इसलिए गडकरी को अब जिम्मेदारी के साथ संगठन यानी पार्टी की इमेज को सुधारना है। वैसे भी बीजेपी को अपर क्लास हिंदुओं की पार्टी ही माना जाता है । इसलिए अब आलोचक बीजेपी को ब्राह्मण जमा पार्टी कहने लगें हैं, तो इसमें कोई हैरानी नहीं है। लेकिन पार्टी को ज्यादा लोकप्रिय बनाने के लिए गडकरी को समाज के दूसरे वर्गों की हिस्सेदारी भी बढ़ानी होगी। वैसे ही बीजेपी की इमेज इस मामले में खराब है कि उसे ओबीसी या पिछड़ी जातियों के नेता हजम नहीं होते हैं। कल्याण सिंह,उमा भारती, अर्जुन मुंडा, बाबूलाल मरांडी से लेकर गोविदाचार्य तक यह बात फिट बैठती है। वैसे आजकल कभी बीजेपी में हिंदुत्व की सशक्त आवाज रहे विनय कटियार भी अब साइडलाइन हो गए है। उनकी पार्टी में कोई अहम भूमिका ही नहीं रही है।
लेकिन अब गडकरी ने बीजेपी के इस नए नाम की काट भी निकाल रही है। बीजेपी कैंप से आ रही खबरों के मुताबिक नागपुर में संघ की मुख्यालय की बगल की गली में रहने वाले गड़करी ने जब से संसद के बगल वाली सड़क पर बने बीजेपी के दफ्तर की कमान संभाली है, तभी से वह पार्टी को युवा चेहरा देने की वकालत में जुटे हुए हैं। तर्क दिया जा रहै है कि देश की आधी आबादी अब युवाओं की है, ऐसे में पार्टी में युवा चेहरे होना नितांत जरूरी है। वह बीजेपी को अब भारतीय जवान पार्टी बनाने की कसरत कर रहे है। वैसे बीजेपी को युवा बनाने की वकालत अनेक बार संघ प्रमुख मोहन भागवत भी कर चुके है और जहां तक गडकरी की सोच का सवाल है, तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि संघ प्रमुख के दिल की बातें गडकरी के दिमाग तक स्वंय ही पहुंच जाती है। उम्मीद की जा रही है कि बीजेपी की नई कार्यकारिणी पहले की अपेक्षा ज्यादा युवा होगी और उसमें शामिल चेहरे 60 की उम्र के नीचे के ही होंगे। वैसे भी 52 वर्षीय नितिन गडकरी के कमान संभालने के बीद अब सही मायने में बीजेपी का नेतृत्व कमोबेश युवा पीढ़ी के हाथों में पहुंच गया हैं । वैसे गडकरी ने नवभारत टाइम्स से की गई विशेष बातचीत में भी साफ किया था कि समाज के जिन वर्गों और देश के जिन हिस्सों में पार्टी कमजोर है, वहां अपनी पैठ बनाने के लिए पार्टी विशेष कोशिश करेगी। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने गडकरी की योजना का खुलासा करते हुए नए साल को पार्टी के लिए सामाजिक विस्तार मिशन की संज्ञा दी है और दलितों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और समाज के सभी कमजोर वर्गों में अपना आधार बढ़ाने के लिए युद्घस्तर पर व्यापक कार्यक्रम चलाने की घोषणा की है। यह सब गडकरी के बीजेपी में गैर ब्राह्मण और युवा चेहरों को शामिल करने की रणनीति का ही हिस्सा है।

Friday, January 1, 2010

बेसहारा लोगों के बीच पहुंचे मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शुक्रवार को नव वर्ष पर सी स्कीम स्थित मदर टेरेसा होम गए और वहां भर्ती मरीजों एवं बुजुर्गो से आत्मीयता से मिले और उनके हालचाल जाने। मुख्यमंत्री को नव वर्ष के पहले दिन ही अपने बीच पाकर होम में भर्ती बेसहारा लोग गद्गद् हो गए और उनकी सादगी एवं संवेदनशीलता मरीजों के दिल को छू गई। गहलोत प्रत्येक मरीज से व्यतिश: मिले और उनके दुख-दर्द को जाना। मुख्यमंत्री ने मरीजों से पूछा कि वे कहां से आए हैं और यहां उनकी सेवा किस तरह से हो रही है। गहलोत ने मरीजों से उनके परिजनों के बारे में भी जानकारी ली। होम में भर्ती मरीजों में से अधिकांश लोग राजस्थान से बाहर के थे। मुख्यमंत्री ने वहां बुजुर्गो एवं मरीजों को स्वेटर एवं फल वितरित किये। गहलोत के साथ उनकी धर्मपत्नी सुनीता गहलोत ने भी मुख्यमंत्री का मानवीय सेवा के कार्य में हाथ बंटाया। जिन बुजुर्गो को चलने-फिरने में तकलीफ थी, मुख्यमंत्री उनके पास खुद पहुंचे और उन्हें सामग्री का वितरण किया। गहलोत सबसे पहले सेंट जोसेफ वार्ड गए। इसके बाद गहलोत डिवाइन मर्सी वार्ड तथा सेक्रेड हार्ट वार्ड में गए। मुख्यमंत्री ने बिस्तर के पास जाकर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की। होम में भर्ती लोग इस बात से काफी खुश थे कि मुख्यमंत्री उनके दुख-दर्द जानने आए हैं।

कानून के लपेटे में किरोड़ी समर्थक, रिपोर्ट दर्ज

दौसा के सांसद डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की गिरफ्तारी के विरोध में नागंल राजावतान में 30 घंटे रास्ता जाम करने वाले करीब तीन सौ लोगों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। इनमें से 12 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज की गई है। डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की गिरफ्तारी के बाद से ही सड़क रोक कर बैठे समर्थकों ने शुक्रवार शाम करीब छह बजे डॉ. मीणा से मोबाइल फोन पर बात होने के बाद ही जाम खोला। नांगल राजावतान को मीणा समाज की हाइकोर्ट भी कहा जाता है।

2010 में भाजपा की नजर 10 मुद्दों पर

आज से शुरू हुए नए साल 2010 के दौरान भाजपा दस मुद्दों पर सरकार के प्रदर्शन पर नजर रखेगी, जिनमें महंगाई, आतंकवाद और नक्सलवाद, पाकिस्तान सहित अन्य विदेशी मामले, कश्मीर को स्वायत्तता और महिला आरक्षण शामिल हैं।भाजपा ने कहा कि गुजरे साल 2009 में महंगाई को काबू करने में सरकार बुरी तरह असफल रही है और इसकी गलत नीतियां ही आवश्यक वस्तुओं के दाम बेलगाम होने की वजह हैं।आतंकवाद को वास्तविक खतरा बताते हुए भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने यहां कहा कि मुंबई आतंकी हमले के बाद सरकार देश की जनता का यह विश्वास अभी तक नहीं जीत पाई है कि वह ऐसी घटनाओं को रोक पाने या उनसे निपट सकने में अब सक्षम है।पाकिस्तान के हालात को गहरी चिंता का विषय बताते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को उस पर पैनी नजर रखनी चाहिए क्योंकि वहां की स्थिति का सीधा रिश्ता भारत की सुरक्षा से भी जुड़ा है।उन्होंने कहा कि राजग शासन में झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ जैसे तीन नए राज्यों का सौहार्दपूर्ण गठन हो गया लेकिन संप्रग शासन एक तेलंगाना राज्य के गठन के मुद्दे से ठीक से नहीं निपट पाई, जिसके कारण पूरा आंध्रप्रदेश अशांत हो गया।अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने संबंधी रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट पर पार्टी ने सरकार को आगाह किया कि वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाए, जिससे अनुसूचित जाति-जन जाति और अन्य पिछड़ों के आरक्षण का कोटा प्रभावित हो।

दिल्ली की पॉलिटिक्स के पचड़े में उलझे गडकरी

बीजेपी के नए प्रेजिडेंट नितिन गडकरी आजकल दिल्ली में बीजेपी पॉलिटिक्स के ऐसे बादशाह हैं, जिनके पास अपने सिपहासलार नहीं है। इसलिए नितिन गडकरी अब अपनी किचन कैबिनेट बनाने की तैयारी में जुटे हुए हैं, उनकी कोशिश है कि पार्टी की नई कार्यकारिणी का गठन जनवरी के अंतिम हफ्ते तक हो जाए, क्योंकि फरवरी में पार्टी का राष्ट्रीय सम्मेलन होना है। लेकिन कार्यकारिणी गठन में दिल्ली के डी 4 नेता और संघ का एक गुट गडकरी के रास्ते में अपनी ओर से कांटे बिछाने की कोशिश कर रहे हैं। मामला कुछ यूं है कि नितिन गडकरी अपनी टीम में संघ के प्रचारक और बीजेपी के महासचिव रहे संजय जोशी को शामिल करना चाहते हैं। आपको याद दिला दें संजय जोशी वही शख्स हैं जो कुछ सालों पहले अश्लील सीडी प्रकरण को लेकर बीजेपी महासचिव पद से टाटा कह गए थे। लेकिन अब गडकरी के पार्टी प्रेजिडेंट बनने के बाद संजय जोशी की वापसी के काफी आसार दिख रहे हैं। संजय जोशी एक तरह से महाराष्ट्र में नितिन गडकरी के राजनैतिक आका रह चुके हैं और आज भी संघ में अच्छी पैठ रखते हैं। असली कहानी यहीं से शुरू होती है। संजय जोशी को लेकर बीजेपी के अंदर काफी विरोध है। सूत्रों के अनुसार आडवाणी और मोदी कैंप संजय जोशी की वापसी किसी भी हाल में नहीं चाहते हैं और इसके लिए आजकल दिल्ली के डी-4 कैंप खास तौर पर सक्रिय हो गया है।
यह कैंप भलीभांति जानता है कि संजय जोशी आज भी पॉलिटिकली काफी स्ट्रॉन्ग हैं और यदि एक बार वह फिर केन्द्रीय स्तर पर सक्रिय पॉलिटिक्स से जुड़ते हैं, तो कई लोगों को किनारे लगाने में कहीं चूकेंगे नहीं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार संघ का एक गुट भी संजय जोशी की वापसी न हो, इसलिए नितिन गडकरी पर दवाब बनाए हुए हैं। यह गुट गडकरी को बता रहा है कि संजय जोशी की वापसी से शीर्ष केन्द्र गडकरी की बजाय जोशी हो जाएंगे। गौरतलब है कि संजय जोशी को एक समय बीजेपी के अंदर संघ की आवाज माना जाता था और उनकी शख्सियत भी बीजेपी में काफी स्ट्रॉन्ग थी । उन्हें सीडी कांड में फंसाने का आरोप भी बीजेपी के ही कुछ शीर्ष नेताओं पर लगा था। संजय जोशी की वापसी कर गडकरी जहां एक ओर अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं, वहीं संघ भी संजय जोशी की वापसी कर बीजेपी के दिल्लीछाप नेताओं पर कंट्रोल करना चाहता है। अब देखना यह है कि नितिन गडकरी की बीजपी में प्रेजिडेंट होते हुए भी कितनी चलती है, क्योंकि अभी तक बीजेपी लालकृष्ण आडवाणी के इशारों पर ही चलती दिखी है और कई बार संघ की सिफारिशों को इग्नोर भी किया जा चुका है । वैसे भगवा बिग्रेड संजय जोशी की वापसी को एक तरह से गडकरी का पहला टेस्ट मान रहा है और इस टेस्ट में उनकी सफलता या असफलता से यह आकलन लगाया जाएगा कि उनकी बीजेपी में अभी उनकी राजनैतिक हैसियत कितनी है।